ग्रीष्मकाल की चांदनी रात, होटों पर एक दबी बात
आंखे शीतल चाँदनी का प्रकाश धुन्दला रही थी
मस्तक पर पढ़ते बल बीती बातें दोहरा रही थी
हवाएं बदन के कम्पन का मुआयेना कर फिजा में गंध घोलती जा रही थी ,
चुम्बक की तरह चिपकी यादें लेशमात्र सोचने का समय भी न देती
रूप के छन्दों में फसा भवरा कल्पना की सीमा में सिमित
प्रेम के प्रवाह में चित निरंतर बहने लगा ये रोके न रुका
स्थायी स्थिर जीवन निरंकुश निराधार होने लगा
सूक्ष्म दृष्टि से प्रकृति तीव्र बाण बरसाने लगी
आँखों से उडी नींद गिद्धों संग मंडराने लगी
प्रेम-कटाक्ष नयनों का उसके, भेद गया दिल मेरा